रामायण के ये 10 विचार जान लें – रहेंगे आप सबसे आगे

अगर आप रामायण के ये 10 विचारों को जान या समझ लेंगे तो आपके कभी भी किसी से पीछे नहीं रहेंगे क्योंकि,रामायण में मनुष्य को ज्ञान कराया गया है कि जीवन में अगर सुख और सफलता प्राप्त करनी है तो राम के भजनों के साथ – साथ सांसारिक व्यवहार का भी ध्यान में रखना होता है|

रामायण के  विचार

बोले बिहसि महेस तब ज्ञानी मूढ़ न कोइ|

जेहि जस रघुपति करन्हि जब सो तस तेहि छन होइ||

इस दोहा में आपको भगवान की लीला के बारे में बताया गया है जिस पर भगवान शिव ने बताया है कि किसी भी मनुष्य को अंहकार नही करना चाहिए कि वह पूरी तरह से सर्वज्ञानी है | जो मनुष्य अंहकार करता है वह समाज में हमेशा पीछे ही रहता है |

नाथ दैव कर कवन भरोसा| सोषिअ सिन्धु करिअ मन रोसा||

इस चौपाई के माध्यम से आपको बताया गया है कि  आप स्वयं में इतने संयमी बने कि किसी भी काम करने के लिए आपको दूसरे का सहारा न लेना पड़े | आप अपने भरोसे पर काम कीजिये क्योंकि भगवान आपकी स्वयं मदद करने के लिए उपस्थित रहेंगे |

काम, क्रोध, मद, लोभ, सब, नाथ नरक के पंथ|

सब परिहारी रघुबीरहि, भजहूँ भजहिं जेहि संत||

इस दोहे के माध्याम से आपको बताया गया है कि मनुष्य को इस धरती पर आने के बाद पाप करने से बचना चाहिए क्योंकि, अगर मनुष्य को लोक और परलोक दोनों जगह सुख, शान्ति और उन्नति प्राप्त करनी हो तो पाप की ओर जाने वाले तत्वों से दूर रहना चाहिए |

निज दुःख गिरि सम रज करि जाना| मित्रक दुःख रज मेरु समाना||

इसमें बताया गया है कि जो मनुष्य अपने दुःख को न देखते हुए दूसरों की सहायता करते हैं ईश्वर हमेशा उसके साथ रहता है |

आगे कह मृदु बचन बनाई| पाछें अनहित मन कुटिलाई||

इस चौपाई में बताया गया है कि ऐसे लोगों या मित्रों से हमेशा बचके रहें जो आपके सम्मुख मीठे वचनों का प्रयोग करें आपके पीठ – पीछे आपकी बुराई करें |

काम बात कफ लोभ अपारा| क्रोध पित्त नित छाती जारा||

इसमें बताया गया है कि मनुष्य को क्रोध नहीं करना चाहिए क्योंकि जो मनष्य क्रोध करता वह जीवन में कभी सफल नहीं पाता है |

नहिं दरिद्र सम दुःख जग माहीं| संत मिलन सम सुख जग नाहीं||

इसका मतलब है कि संसार में गरीबी से बढ़कर कोई दुःख नहीं हो और संतो से मिलने के समान दुनिया कोई सुख नहीं है | इसलिए हमेशा संतो से जुड़े रहना चाहिए |

सुनहु भारत भावी प्रबल, बिलखि कहेहुं मुनिनाथ|

हानि, लाभ, जीवन, मरण, यश, अपयश विधि हाँथ||

इसका मतलब है मनुष्य को अपने जीवन में कभी भी किसी चीज के लिए हार नहीं माननी चाहिए |

अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते।

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ||

इसका मतलब है कि जो मनुष्य अपनी जन्म भूमि से जुदा होता है वह वहां के मूल्यों को आगे ले जाता है और वही वही हमेशा दूसरों से भी आगे रहता है |

‘दीन दयाल बिरिदु संभारी, हरहु नाथ मम संकट भारी’||

इसका मतलब है कि ‘प्रभु से कहना कि दीनों पर दया करना तो आपका विरद है. उसी विरद को याद करके हे नाथ, आप मेरे इस भारी संकट को हर लीजिए.’