Raja Ram Mohan Roy Jayanti : राजा राममोहन राय की 247वीं जयंती, समाज सुधारक के रूप में कैसे हुए प्रसिद्ध

    Raja Ram Mohan Roy Jayanti : समाज में फैली बुरी कुरुतियों का विरोध करने वाले देश के महान समाज सुधारक राजा राम मोहन राय की आज 22 मई 2019 को 247वीं जयंती है। ‘भारतीय पुनर्जागरण के जनक’ और ‘आधुनिक भारत के निर्माता’ के तौर पर समाज आज भी इन्हे याद करता है|  राजा राम मोहन राय ने 19वीं सदी में समाज सुधार के लिए अनेक आंदोलन चलाए, जिनमें से सबसे प्रमुख आंदोलन सती प्रथा को खत्म करने के लिए बिगुल बजाने वाला था, जो सफल भी हो गया था|

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    समाज में फैली कुरूतियों को दूर करने का आंदोलन

    भारतीय पुनर्जागरण के जनक राजा राम मोहन राय का जन्म 22 मई, 1772 को पश्चिम बंगाल में हुगली जिले के राधानगर गांव में हुआ था। लगभग 15 साल की उम्र में राजा राममोहन को बंगाली, संस्कृत, अरबी और फारसी भाषा का ज्ञान सीख लिया था और इसी छोटी सी आयु में उन्होंने देश में काफी भम्रण भी कर चुके थे| इसके बाद जब वो 17 साल हुए तो उन्होंने मूर्ति पूजा का विरोध करना शुरू किया और उन्होंने समाज में फैली बुरी कुरुतियों को दूर किया और साथ में ही देश को अंग्रेजों से मुक्त कराने की लड़ाई में भी आगे से आगे शामिल रहें|  

    मूर्तिपूजा का किया विरोध

    मूर्तिपूजा के विरोध में भाग लेने वाले  राजा राम मोहन राय की आस्था एकेश्‍वरवाद में थी। उनका साफ कहा था कि, ईश्वर  की उपासना के लिए कोई खास पद्धति या नियत समय नहीं हो सकता। राय जी ने पिता से धर्म और आस्था को लेकर कई मुद्दों पर मतभेद था, जिसके कारण छोटी आयु में  ही उन्होंने अपना घर त्याग दिया था। इस दौरान उन्होंने  हिमालय और तिब्बत  के क्षेत्रो के दौरे के लिए गए और चीजों को तर्क के आधार पर समझने का पूरी तरह से प्रयास किया|

    सती प्रथा अंत  

    राजा राम मोहन राय ने 1828 में ब्रह्म समाज की स्‍थापना की थी, जो पहला भारतीय सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन कहलाता था। इस दौर में भारतीय  समाज में ‘सती प्रथा’ जोरों पर थी। इसके बाद उन्‍होंने उस दौर की अन्‍य सामाजिक बुराइयों- बहुविवाह, बाल विवाह, जाति-व्‍यवस्‍था, शिशु हत्या, अशिक्षा का भी खात्मा करने के लिए  मुहिम चलाई और काफी हद तक इसमें  सफल भी हुए थे|

    धर्म पर दिया जोर

    काफी समय बाद जब वे घर लौटे तो उनके माता-पिता ने उनकी शादी करा दी, ताकि उनमें ‘कुछ सुधार’ आ जाए| लेकिन वो हिंदुत्व की गहराइयों को समझने में लगे रहे| उन्होंने उपनिषद और वेदों को पढ़ा और ‘तुहफत अल-मुवाहिदीन’ लिखा। यह उनकी पहली पुस्तक थी और इसमें उन्होंने धर्म में भी तार्किकता पर काफी जोर देते हुए रूढ़ियों का विरोध किया|

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