Thursday, April 22, 2021
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ऋषि पंचमी आज, जानिए व्रत कथा, पूजन विधि और इस पर्व का महत्व

आज मंगलवार 3 सितंबर को ऋषि पंचमी व्रत मनाया जाता है। इस व्रत को सभी भक्त शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को रखते है। वहीं इस व्रत को लेकर मान्यता है कि, रजस्वला काल (माहवारी) के समय अगर किसी महिला से भूल हो जाती है, तो इस व्रत को करने से उन्हें मोक्ष प्राप्त हो जाता है| इसके साथ ही जो महिलायें इस व्रत को करती हैं, उन्हें सौभाग्य की प्राप्ति होती है| वहीं इस व्रत का शुभ मुहूर्त सुबह 11 बजकर 5 मिनट से शुरु होकर दोपहर 01 बजकर 36 मिनट तक रहेगा|

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ऋषि पंचमी व्रत की कथा  

मान्यता है कि, विदर्भ देश में उत्तंक नामक एक सदाचारी ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी बड़ी पतिव्रता थी, जिसका नाम सुशीला था। उस ब्राह्मण के एक पुत्र तथा एक पुत्री दो संतान थी। विवाह योग्य होने पर उसने समान कुलशील वर के साथ कन्या का विवाह कर दिया। दैवयोग से कुछ दिनों बाद वह विधवा हो गई। दुखी ब्राह्मण दम्पति कन्या सहित गंगा तट पर कुटिया बनाकर रहने लगे।

एक दिन ब्राह्मण कन्या सो रही थी, कि उसका शरीर कीड़ों से भर गया। कन्या ने सारी बात मां से कही। मां ने पति से सब कहते हुए पूछा- प्राणनाथ! मेरी साध्वी कन्या की यह गति होने का क्या कारण है? उत्तंक ने समाधि द्वारा इस घटना का पता लगाकर बताया- पूर्व जन्म में भी यह कन्या ब्राह्मणी थी। इसने रजस्वला होते ही बर्तन छू दिए थे। इस जन्म में भी इसने लोगों की देखा-देखी ऋषि पंचमी का व्रत नहीं किया, इसलिए इसके शरीर में कीड़े पड़े हैं। 

धर्म-शास्त्रों की मान्यता है कि, रजस्वला स्त्री पहले दिन चाण्डालिनी, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी तथा तीसरे दिन धोबिन के समान अपवित्र होती है। वह चौथे दिन स्नान करके शुद्ध होती है। यदि यह शुद्ध मन से अब भी ऋषि पंचमी का व्रत करें तो इसके सारे दुख दूर हो जाएंगे और अगले जन्म में अटल सौभाग्य प्राप्त करेगी। पिता की आज्ञा से पुत्री ने विधिपूर्वक ऋषि पंचमी का व्रत एवं पूजन किया। व्रत के प्रभाव से वह सारे दुखों से मुक्त हो गई। अगले जन्म में उसे अटल सौभाग्य सहित अक्षय सुखों का भोग मिला।

ऋषि पंचमी व्रत की विधि 

इस दिन व्रत करने वाली सभी महिलाओं को सुबह सूरज निकलने से पहले  स्नान आदि से निवृत्त हो लें| इसके बाद घर को गोबर से  लीप कर  सप्तऋषि और देवी अरुंधती की प्रतिमा बनाई जाती है। फिर वहीं उस प्रतिमा और कलश की स्थापना की जाती है और इसके बाद  सप्तऋषि की कथा सुनी जाती है। इस दिन व्रत करने महिलाएं बोया हुआ अनाज  नहीं खाती है  वो इस दिन केवल पसई धान के चावल खाकर व्रत रखती है|

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