सोशल मीडिया और मानवीय व्यवहार के पैटर्न में बदलाव : एक अध्ययन

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मुझे इस लेख को लिखने की प्रेरणा, समाज में हो रहे मानव के व्यवहारात्मक परिवर्तन तथा इससे होने वाले दुष्परिणाम जो कि अधिकतम सोशल मीडिया के प्रयोग से घटित होगा और हो रहा है, इसे कैसे रोका जाये इस बात की चिंता ने इस लेख को लिखने के लिए प्रेरित किया इसी के परिणाम स्वरुप ये लेख आपके सामने प्रस्तुत है आशा करता हूं इसको पूरा पढने के उपरांत विशेष रूप से हमारा युवा वर्ग इन बातो पर अमल करेगा, जिससे आगे होने वाले खतरनाक परिणामो को रोका जा सके |

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अगर ये कहे तो बिलकुल सत्य है कि अब बिना डिजिटल मीडिया के जिसे आजकल हम सब लोग सोशल मीडिया कहते हैं, आज का अधिकांश मानव समाज इसके बिना नहीं रह सकता या वो रह ही नहीं पायेगा ऐसी लत या आदत जो लग गई है | बिना फेसबुक, व्हाट्सएप्प, ट्विटर के आज आदमी अपनी सामाजिक जीवन की कल्पना नहीं कर सकता और ये तब है, जबकि वास्तविक रूप से ये प्लेटफ़ॉर्म पूरी तरह सामाजिक नहीं हैं | ये पूरी तरह सामाजिक क्यों नहीं है, इसके कारणों पर चर्चा मैं आगे करूँगा |

इससे पहले आइये देखते हैं कि इसकी शरुआत कब और कैसे हुई, तो सोशल मीडिया या यूँ कहे कि डिजिटल मीडिया, जिसमे आजकल फेसबुक का नाम सबसे पहले आता है, इसकी शुरुवात 2004 मे हुई लेकिन पूरी तरह से भारत सहित दुनिया के अधिकतम देशों मे यह 2012 तक 2 करोड़ से ज्यादा यूजर के साथ दुनिया के सबसे बड़े  सोशल नेटवर्क प्लेटफ़ॉर्म के रूप मे स्थापित हो गया था  |  

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वैसे इससे पहले भी एक सोशल प्लेटफार्म ऑरकुट नाम से था, जो कि गूगल कंपनी द्वारा संचालित था किन्तु वो फेसबुक जितना प्रसिद्धि नहीं पा सका इसके कारणों पे हम यहाँ चर्चा नहीं करेंगे क्योकि असल मुद्दा सोशल मीडिया और मानवीय व्यवहार है ना कि ऑरकुट क्यों फेसबुक मीडिया से पीछे रहा इस पर चर्चा करना | आज फेसबुक के अतिरिक्त अन्य और भी ऐसे प्लेटफार्म हैं जो कि सोशल मीडिया प्लेटफार्म के श्रेणी में आते हैं इनमे व्हाट्सएप्प, ट्विटर, पेंटीरेस्ट(Pinterest), इत्यादि प्रमुख हैं |

जब इसकी शरुवात हुई और लोगों ने इसके प्रयोग में लाना शुरू किया तो ऐसा माना जा रहा था कि ये बहुत ही ज़बरदस्त प्लेटफार्म सिद्ध होगा, जिस पर लोग अपने विचारों को साझा करके किसी विषय पर विमर्श करेंगे और उससे सम्बंधित समस्याओं के समाधान निकालेंगे, जिससे समाज को इस माध्यम से बहुत लाभ होगा | लोगो की किसी समस्या या किसी भी मुद्दे पर अधिक रूप से सहभागिता होगी और इससे लोकतंत्र को भी मजबूती प्रदान होगी | यहाँ पर वो लोग भी अपनी बात को रख सकेंगे जो मुख्य धारा की मीडिया मे नहीं रख पाते | इस प्रकार ये नेटवर्क प्लेटफार्म अच्छाई के लिए प्रयोग होने वाले प्लेटफ़ॉर्म के रूप में शुरू हुआ था पर अफ़सोस इसका प्रयोग इस रूप में अधिकतम ना होकर दुसरे रूप में होने लगा जिसके दुष्परिणाम हम आज कल देख रहे हैं |

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आइये अब देखते हैं कि ऐसा क्या हुआ जो इतना अच्छा प्लेटफार्म जिसके बारे में बहुत ही सकारात्मक विचार थे अब उसके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं | यहाँ मैं इस लेख में इस बात को ही फोकस में रखूँगा कि सोशल मीडिया के उपयोग से मानवीय व्यवहार और मानवीय व्यवहार करने के पैटर्न में क्या बदलाव देखने को मिल रहा है, इसके बाद हम ये भी जानेंगे कि इन बदलावों के क्या कारण है |

अक्सर जब भी हम कोई नई चीज़ ग्रहण करते या अपनाते  है तो भाव यही होता है कि जो हम कर रहे थे उसमे नये तरीके या यू कहें कि नई चीज़ को ग्रहण करने से बेहतर परिणाम हासिल होंगे लेकिन अगर नतीजे एकदम उलट आने लगे या उसके अधिकतम प्रयोग से लाभ के स्थान पर हानि होने लगे तो हम कह सकते हैं कि ये बेहद खतरनाक स्थिति है | यही स्थिति सोशल मीडिया के अधिकतम उपयोग से निकलकर बाद वाले दिनों में सामने आई है | यहाँ हम अगर गौर करें तो पाएंगे कि इस प्लेटफ़ॉर्म का उपयोग हम जिस स्तर पर काम कर रहे थे उसमे और जिन्दादिली तथा बेहतरी लाने के लिए किया गया था | लेकिन यहाँ अब हमारी व्यक्तिगत जिन्दगी और जो हम काम कर रहे हैं दोनों मिल सी गई प्रतीत होती है | यहाँ दोनों में अन्तर कर पाना बेहद मुश्किल सा हो गया है |

उपरोक्त वर्णित बातों से हम देखते हैं कि कही न कही ये सोशल मीडिया प्लेटफार्म जिसमे फेसबुक और व्हाट्स एप्प प्रमुखता से उपयोग होतें हैं – इनसे मानव के स्वभाव, उसके सोचने का नजरिया, उसके समाजिक कार्य करने के तरीके और यहाँ तक की उसके किसी भी विषय पर प्रतिक्रिया देने का अंदाज पहले से जुदा है | कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च में ये बात सामने आई है कि जो सोशल मीडिया का अधिकता से उपयोग कर  रहे हैं ,उनमे मनोरोगी होने की समस्या पाई गई है, इसमें मनोग्रसित बाध्यता विकार (Obsessive Compulsive Disorder), अवसाद(Depression), लत (Addiction),  दर्शनरति (Voyeurism), रोगभ्रम (Hypochondriasis) प्रमुख हैं |

दिलचस्प बात ये है कि इन्टरनेट की आसान उपलब्धता होने से ये लाभ के बजाय हानिकारक सिद्ध हो रहा है | कुछ क्षेत्रो को छोड़ दें तो अधिकतर नौकरी पेशे में  ‘सोशल मीडिया’ एक अहम हिस्सा है, यहाँ तक तो ठीक है कि अगर आप ऑफिस या वर्किंग फील्ड में इसका इस्तेमाल कर रहे तो कोई ज्यादा नुकसान नहीं परन्तु इसके बाद भी बिना किसी उद्देश्य के इसका उपयोग करते रहना यही परेशानी का कारण है | इन्टरनेट और ये खासकर सोशल / डिजिटल मीडिया के अधिकतम उपयोग से  यह ‘सोशल मीडिया’ मानव के जीवन का एक ख़ास अंग हो गया है और ये एक फोबिया के रूप में उभर कर सामने आया है | इसके अधिकतम इस्तेमाल से मानव का व्यवहार बदल सा गया है | उसमे धैर्य कि कमी हो गई है |

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इसको एक उदाहरण से समझते है-

आज अधिकतर जो भी सोशल मीडिया का प्रयोग कर रहे वो किसी भी चीज़ की तुरंत प्रतिक्रिया पाने कि चाहत रखते हैं जैसे अक्सर हम कुछ भी पोस्ट करते है चाहे वो कोई लेख, पिक्चर या इसी तरह का कोई भी कंटेंट, उस पर हम प्रतिक्रिया का इतंजार करने लगते है यहाँ इतंजार करना कुछ बुरा नहीं है परन्तु बार – बार  सोशल मीडिया पर जाकर प्रतिक्रिया को चेक करना एक तरह का फोबिया है आप इंस्टेंट (तुरंत) की गिरफ्त में आ जाते  हैं ये वैसे तो ये कोई समस्या नहीं लगती पर इसके बेहद खतरनाक परिणाम आपकी जिन्दगी पर पड़ते हैं, यहाँ जब हमें आशा के अनुरूप प्रतिक्रिया नहीं मिलती या देर से मिलती है तो हमारे मस्तिष्क से कुछ ऐसे हार्मोन्स स्रावित होते है जो हमको चिढ़चिढ़ा बना देते हैं |

ऐसे ही एक लेखक ने इंटरव्यू में बताया  है  कि “ ये इंस्टेंट की भूख का फोबिया जो जिन्दगी में आया है इससे 90 प्रतिशत से भी ज्यादा ऐसा असर है जो देखने में तो बिलकुल भी नुकसानदेह नहीं लगता पर दूरगामी परिणाम अच्छे नहीं होते ये आगे कहते हैं कि अक्सर लोग खाना खाते है उसका फोटो लेकर आप सोशल मीडिया पर पोस्ट कर देते हैं इससे किसी का नुकसान तो नहीं हो रहा पर अगर गौर करें तो ऐसा लगातार करने से खाने की तस्वीरे देखकर हमारे दिमाग में जो न्यूरान्स निकलते हैं वो कम हो जायेंगे इससे हम वास्तविक चीजों के प्रति हमारा मोह भंग हो जायेगा जैसे जलेबी देखकर मेरे मन में जो भावनाए जाग्रत होती थी, अब मैं तस्वीरों में इतनी बार देख चुका हूँ कि शायद अब कम उठेंगी | ” इसी प्रकार हम और भी केस देख सकते हैं जिसमे इस तरह की समस्या आ सकती है |

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अब हम बात करते है युवा वर्ग की, ख़ास कर युवा वर्ग पर सोशल मीडिया का बहुत दुस्प्रभाव पड़ा है | मै यहाँ केवल युवा वर्ग को ज्ञान के नाम पर जो परोसा जा रहा उस मुद्दे पर प्रकाश डालना चाहूँगा, उसका कारण ये है कि यदि सही ज्ञान अगर सही रूप में युवाओ को मिले तो वो सब तरह से अपने आप को इस काबिल बना सकता है जिससे वो समाज और देश के विकास में योगदान दे सकेगा |

यहाँ इसी बात पर मैं चर्चा करना चाहूंगा कि कैसे आज सोशल मीडिया युवाओ के ज्ञान अर्जन (ज्ञानार्जन) को प्रभावित कर रहा है | इसमें आधा अधुरा ज्ञान वाला प्रकरण प्रमुख है जिसमे फेसबुक और व्हाट्सएप की भूमिका मुख्य रूप से हैं | आइये समझते है कि कैसे आज का युवा वर्ग आधे अधूरे ज्ञान के गर्त में फंसता चला जा रहा है | यहाँ पर, चाहे वो व्हाट्स एप हो या फेसबुक प्लेटफ़ॉर्म दोनों जगह पर किसी भी टॉपिक या विषय पर एक लाइन की हैडिंग या कुछ एक लाइन्स से उस विषय पर युवा अपनी समझ विकसित करने लगते हैं या यूँ कहे कि अपनी समझ बना लेते हैं ये घातक है जहाँ तक मै मानता हूँ ये हमारी युवा पीढ़ी को बहुत ही निम्न स्तरीय ज्ञान प्रदान कर रहा हैं, क्यों कि इस ज्ञान में विषय की गहराई और उसका दर्शन लुप्त हैं , जिसको हम यहाँ वन लाइनर ज्ञान की संज्ञा दे सकते हैं जोकि युवा वर्ग के लिए बेहद खतरनाक स्थिति है |

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एक रिपोर्ट के अनुसार युवाओ का सबसे ज्यादा यूजर आधार इस प्लेटफ़ॉर्म को प्रयोग करने का है, तो ऐसे में यूजर आधार के अनुसार भी देखा जाये तो युवा सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाला वर्ग है | इस तरह हम देख सकते हैं कि युवा वर्ग कैसे इस प्लेटफ़ॉर्म पर उपलब्ध अधिकतर कंटेंट जोकि बिना गहराई के होते हैं उनको ग्रहण कर रहा है, यह एक भयावह स्थिति है | इस प्लेटफ़ॉर्म पर उपलब्ध हर एक कंटेंट के बारे में मेरा यह कहना नहीं है लेकिन अधिकतर कंटेंट इसी श्रेणी में रखे जा सकते हैं | ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि आज युवाओ को उनके सामने जो भी कंटेंट परोसा जाये तो युवाओ को उस विषय की गहराई तक पहुचे बिना उस कंटेंट के बारे में अपनी राय पुख्ता नहीं करनी चाहिए |

अब देखते हैं कि जिसका नाम हम बहुत जोर शोर से समाजिक मीडिया ले रहे है जो सोशल मीडिया के नाम से प्रसिद्ध है वो पूरी तरह से सामाजिक नहीं है | इस प्लेटफ़ॉर्म पर उपलब्ध अधिकतर समाग्री या कंटेंट अक्सर पेड कंटेंट का हिस्सा होते हैं, जिसका सरोकार बिलकुल सामाजिक नहीं होता वो केवल व्यवसायिक पुष्टिकरण के लिए होता है |

अधिकतर कंटेंट जो कि व्हाट्स एप और फेसबुक के माध्यम से लोगो तक पहुचते हैं उनका उद्देश्य ज्ञान सृजित करना नहीं होता बल्कि इससे अन्य उद्देश्यों की पूर्ति की जा रही है, जो हमारे समाज और देश को गलत दिशा में अग्रसित कर रहा है और हमारे व्यवहार में निरंतर बदलाव ला रहा है, यह बदलाव सकारात्मक न होकर नकारात्मक मानवीय व्यवहार पैटर्न देखने में आता है जो कि बहुत ही बड़ा बदलाव है, जिसके बारे में बहुत गहराई से सोचने की आवश्यकता है | साथ ही हमारी सरकारों को भी चाहिए कि इसके लिए कोई ठोस नीति बनाये ताकि हमारा युवा वर्ग और समाज देश के विकास में सहभागी बन सके |


दिनेश चंद्र त्रिपाठी

(लेखक, सूचना प्रौद्योगिकी एवं साइबर लॉ विशेषज्ञ हैं)

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